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J.s.sandhu


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J.s.sandhu

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Sunday, November 13, 2011

श्रीबगला पञ्जर स्तोत्र


(यह स्तोत्र शेवागम-सारोक्त है । इसी स्तोत्र के उपयोग से मथुरा (उ॰प्र॰) के प्रख्यात स्व॰ विष्णु भट्ट अथर्ववेदी ने विपुल यशार्जन किया था)
इस स्तोत्र के सहस्र (एक हजार) पाठ सिद्धि-प्राप्ति के लिए पहले करने चाहिए । फिर सौ पाठ अनुष्ठान कार्य-सिद्धि के लिए करना चाहिए ।
नित्य कर्म करके स्व-शरीर-रक्षार्थ इस ‘पञ्जर-स्तोत्र’ का पाठ करना चाहिए । पहले हाथ में जल लेकर संकल्प पढ़ें । फिर विनियोगादि सविधि करे । यथा -
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीमत्-पीताम्बरा-बगला-मुखी-पञ्जर-रुप-मन्त्रस्य भगवान् नारद ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, जगद्-वशंकरी पीताम्बरा बगला देवता, ह्लीं बीजम्, स्वाहा शक्तिः, क्लीं कीलकम्, अमुक-गोत्रोत्पन्नस्य अमुक शर्मणः (वर्मणः, गुप्तस्य, दासस्य वा) मम स्व-शरीर-रक्षा-पूर्वकं पर-सैन्य-मन्त्र-तन्त्र-यन्त्रादि-विपक्ष-क्षयार्थे स्वाभीष्ट-सिद्धये च जपे विनियोगः ।
ऋष्यादि-न्यासः- भगवते नारद ऋषये नमः शिरसि, अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे, जगद्-वशंकरी पीताम्बरा बगला देवतायै नमः हृदये, ह्लीं बीजाय नमः दक्ष-स्तने, स्वाहा शक्तये नमः वाम-स्तने, क्लीं कीलकाय नमः नाभौ, मम स्व-शरीर-रक्षा-पूर्वकं पर-सैन्य-मन्त्र-तन्त्र-यन्त्रादि-विपक्ष-क्षयार्थे स्वाभीष्ट-सिद्धये च जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।
कर-शुद्धि-न्यास मूल-मन्त्र से करे ।
षडङ्ग-न्यास कर-न्यासअंग-न्यास
ह्लांअंगुष्ठाभ्यां नमःहृदयाय नमः
ह्लींतर्जनीभ्यां नमःशिरसे स्वाहा
ह्लूंमध्यमाभ्यां नमःशिखायै वषट्
ह्लैंअनामिकाभ्यां नमःकवचाय हुं
ह्लौंकनिष्ठिकाभ्यां नमःनेत्र-त्रयाय वौषट्
ह्लःकरतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमःअस्त्राय फट्

व्यापक-न्यासः- मन्त्र-राज से करें ।
ध्यानः- हाथ में पीले फूल, पीले अक्षत और जल लेकर ‘ध्यान’ करे -
मध्ये सुधाब्धि-मणि-मण्डप-रत्न-वेद्याम्,
सिंहासनोपरि-गतां परिपीत-वर्णाम् ।
पीताम्बराभरण-माल्य-विभूषितांगीम्,
देवीं नमामि धृत-मुद्-गर-वैरि-जिह्वाम् ।।
अर्थात् अमृत का सागर । बीच में मणि-मण्डप की रत्न-वेदी । उस पर सिंहासन । उस पर पीले रंग की देवी ‘बगला’ आसीन हैं । उनके वस्त्र, आभूषण तथा पुष्प-माला- सब कुछ पीले रंग के ही हैं । बाँएँ हाथ में शत्रु की जीभ खींचकर, दाहिने हाथ से मुद्-गर लेकर, उस पर प्रहार करने जा रही है । उन्हीं माँ बगला को मेरा प्रणाम ।।
।। मानस-पूजन ।।
श्रीपीताम्बरायै नमः लं पृथिव्यात्मकं गन्धं परिकल्पयामि ।
श्रीपीताम्बरायै नमः हं आकाशात्मकं पुष्पं परिकल्पयामि ।
श्रीपीताम्बरायै नमः यं वाय्वात्मकं धूपं परिकल्पयामि ।
श्रीपीताम्बरायै नमः रं तैजसात्मकं दीपं परिकल्पयामि ।
श्रीपीताम्बरायै नमः वं अमृतात्मकं नैवेद्यं परिकल्पयामि ।
श्रीपीताम्बरायै नमः सं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं परिकल्पयामि ।
अब ‘योनि-मुद्रा‘ से प्रणाम कर ‘पञ्जर-न्यास’ करे ।
।।श्रीसूत उवाच ।।
सहस्रादित्य-संकाशं, शिवं साम्बं सनातनम् ।
प्रणम्य नारदः प्राह, विनम्र-नत-कन्धरः ।।
।। श्रीनारद उवाच ।।
भगवन्, साम्ब, तत्त्वज्ञ, सर्व-दुःखापहारक !
श्रीमत्-पीताम्बरा-देव्याः, पञ्जरं पुण्यदं सदा ।।
प्रकाशय विभो, नाथ ! कृपां कृत्वा ममोपरि ।
यद्यहं तव पादाब्ज-धूलि-धूसरितः सदा ।।
।। श्रीशिव उवाच ।।
पञ्जरं तत् प्रवक्ष्यामि, देव्याः पाप-प्रणाशनम् ।
यं प्रविश्य न वाधन्ते, वाणैरपि नरा भुवि ।।
।। ॐ ऐं ह्लीं श्रीं ।।
श्रीमत्-पीताम्बरा देवी, बगला बुद्धि-वर्द्धिनी ।
पातु मामनिशं साक्षात्, सहस्रार्क-युत-द्युतिः ।।
।। ॐ ऐं ह्लीं श्रीं ।।
शिखादि-पाद-पर्यन्तं, वज्र-पञ्जर-धारिणी ।
ब्रह्मास्त्र-संज्ञा या देवी, पीताम्बरा-विभूषिता ।।
।।ॐ ऐं ह्लीं श्रीं ।।
श्रीबगला ह्यवत्वत्र, चोर्ध्व-भागं महेश्वरी ।
कामांकुशा कला पातु, बगला शास्त्र-बोधिनी ।।
।। ॐ ऐं ह्लीं श्रीं ।।
पीताम्बरा सहस्राक्षा, ललाटं कामितार्थदा ।
पातु मां बगला नित्यं, पीताम्बर-सुधारिणी ।।
।। ॐ ऐं ह्लीं श्रीं ।।
कर्णयोशऽचैव युग-पदति-रत्न-प्रपुजिता ।
पातु मां बगला-देवी, नासिकां मे गुणाकरा ।।
।। ॐ ऐं ह्लीं श्रीं ।।
पीत-पुष्पैः पीत-वस्त्रैः, पूजिता वेद-दायिनी ।
पातु मां बगला नित्यं, ब्रह्म-विष्ण्वादि-सेविता ।।
।। ॐ ऐं ह्लीं श्रीं ।।
पीताम्बरा प्रसन्नास्या, नेत्रयोर्युग-पद्-ध्रुवौ ।
पातु मां बगला नित्यं, बलदा पीत-वस्त्र-धृक् ।।
।। ॐ ऐं ह्लीं श्रीं ।।
अधरोष्ठौ तथा दन्तान्, जिह्वां च मुखगा समाः ।
पातु मां बगला देवी, पीताम्बर-सुधारिणी ।।
।। ॐ ऐं ह्लीं श्रीं ।।
गले हस्तौ तथा बाहौ, युग-पद्बुद्धि-दासताम् ।
पातु मां बगला देवी, दिव्य-स्रगनुलेपना ।।
।। ॐ ऐं ह्लीं श्रीं ।।
हृदये च स्तनौ नाभौ, वटावपि कृशोदरी ।
पातु मां बगला नित्यं, पीत-वस्त्रावृता घना ।।
जंघायां च तथा चोरौ, गुल्फयोश्चाति-वेगिनी ।
अनुक्रमेण यत्-स्थानं, त्वक्-केश-नख-लोममे ।
असृङ्-मांसं तथाऽस्थीनि, सन्ध्यः सन्ति मे पराः ।
ताः सर्वा बगला देवी, रक्षेन्मे च मनोहरा ।।
।। श्रीशिव उवाच ।।
इत्येतद् वरदं गोप्यं, कलावपि विशेषतः ।
पञ्जरं बगला-देव्या, घोर-दारिद्र्य-नाशनम् ।।
पञ्जरं यः पठेत् भक्त्या, स विघ्नैर्नाभि-भूयते ।
अव्याहत-गतिश्चापि, ब्रह्मा-विष्ण्वादि-सत्परे ।।
स्वर्गे मर्त्ये च पाताले, तारकं परमाद्भुतम् ।
न बाधन्ते नर-व्याघ्र-पञ्जरस्थं कदाचन ।।
अतो भक्तैः कौलिकैश्च, स्व-रक्षार्थ सदा हि ।
पठनीयं प्रयत्नेन, सर्वानर्थ-विनाशनम् ।।
महा-दारिद्र्य-शमनं। सर्व-मांगल्य-वर्धनम् ।
विद्या-विनय-सत्सौख्यं, महा-सिद्धि-करं परम् ।।
यः पञ्जरं प्रविश्यैवं, मन्त्रं जपति वै भुवि ।
कौलिको वाऽकौलिको वा, व्यास-वद् विचरेद् भुवि ।।
इदं ब्रह्मास्त्र-विद्याया, पञ्जरं साधु गोपितम् ।
पठेत् स्मरेद् ध्यान-संस्थः, स जयेन्मरणं नरः ।।
चन्द्र-सूर्य-समो भूत्वा, वसेत् कल्पायुतं भुवि ।
इति कथितमशेषं, श्रेयसामादि-बीजम् ।।
।। सूत उवाच ।।
भव-शत-दुरितघ्नं, ध्वस्त-मोहान्धकारम् ।
स्मरणमतिशयेन, प्रातरेवाऽत्र मर्त्त्यो ।।
यदि बिशति सदा वै, पञ्जरं पण्डितः स्यात् ।।
अन्त में ‘श्रीपीताम्बरार्पणमस्तु’ कहकर जल छोड़ें ।